कल सपनों के बारे में बात की। कुछ ने कहा की सपने अच्छे होते हैं तो कुछ ने कहा की बुरे। कुछ ने कहा की स्वप्न हमें हमारे अंदर, हमारे गर्भ में कहीं गहराई में डेरा डाली हमारी आकांक्षाओं के प्रतिबिंब होते हैं तो किसी ने स्वप्नों को वैज्ञानिक तौर पर समझाने का प्रयास किया। बात शुरू हुई तो उसे दूर तक तो जाना ही था। कुछ ऐसे वाकये भी सामने आए जिन्हें सुन कुछ ने हैरानी ज़ाहिर की । सपने आखिर हैं ही इतने हैरतअंगेज करने वाले।
यह सब हुआ कब? किस बात की बात हो रही है? नए पाठकों के लिए मैं ब्लॉग के एक पुराने लेख "व्हाट इज सिविलाइज़ेशन अंडर ए लॉकडाउन" ("लॉकडाउन के समय एक सभ्यता क्या है?" - लिंक इस लेख के एंड़नोट्स में संलग्न है) पर नज़र डालने का अनुरोध करूंगा। संक्षेप में यह की कोरोना संकट में लाकडाउन लगने के पश्चात मेरी एक प्रिय अध्यापिका ने एक साप्ताहिक बातचीत का ऑनलाइन कार्यक्रम करना शुरू किया। इसमें उनके नए-पुराने शिष्य, मित्र व साथी अध्यापकगण भाग लेते हैं व अपने ख्याल व मत प्रस्तुत करते हैं। वाद-विवाद होता है। सूचना व विचारों का यू प्रवाह होता है मानो हिमालय से पनपी एक तरुण, निर्मल धारा कल-कल कर झर रही हो। इसी मेलजोल का विषय कल "स्वप्न और कुस्वप्न" ("ड्रीम्स एंड नाइटमेयर्स") था।
सपनों की पृष्टभूमी
हर रात हमें नींद में यूं तो कई ही सपने आते हैं लेकिन याद हमें ज्यादातर वहीं रहते है जो कि आर.ई.एम. निद्रा ("रेपिड आई मोशन" नींद, अर्थात नींद का वह भाग जब निद्रावस्था में भी हमारी आंखे तेजी से घूमती, हिलती हैं) के दौरान आते हैं। इस दौरान हमारे मस्तिष्क की गतिविधि जागृत अवस्था जितनी ही होती है। हमारा मस्तिष्क हमें कुछ तस्वीरे, आवाज़ें, संवेदनाएँ, आदि महसूस कराता है - जैसे कि वे सभी जीवंत हो, वास्तविक जगत में ही घटित हो रही हो। इस दौरान मस्तिष्क हमारे शरीर को कुछ इस तरह काबू करके रखता है जिससे कि कहीं स्वप्नों के हमारे शारीरिक संचलन के साथ ही वास्तविक तौर पर भी हम न चलने लगें।
यह दिखाता है कि स्वप्न के सफल और सुरक्षित कार्यान्वयन खास के लिए हमारे शरीर में कई जटिल बदलाव और अनुकूलन हुए हैं। जाहिर है कि अनुसंधान कार्य के दौरान मेरे सामने सबसे उक्त सवाल यह ही था कि मानविक क्रम-विकास में स्वप्न का उद्भव कैसे हुआ होगा? मनुष्य की जीवन-प्रत्याशा बढ़ाने में और मानव जाति की उत्तरजीविता सुनिश्चित करने में स्वप्न का क्या महत्व रहा होगा? इस हेतु मैंने एक शोध पत्र पढ़ा (लिंक इस लेख के एंड़नोट्स में संलग्न है) जिसमें शोधकर्ताओं ने एक प्रसिद्ध मत के लिए साक्ष प्रस्तुत किए।
उन्होंने कहा कि लगभग 70% सपनों में हम किसी आम या खास संकट से लड़ रहे होते हैं। इसका एक बेहद सामान्य उदाहरण एक ऐसा स्वप्न है जो हम सभी ने अनुभव किया होगा। परीक्षा का समय अप्रत्याशित होता है और कई लोग सपनों में देखते हैं कि वे परीक्षा कक्ष में अपने कलम आदि ले जाना भूल गए या वे निर्धारित यूनिर्फाम में नहीं हैं। कई लोग देखते है कि वे समय पर परीक्षा कक्ष नहीं पहुँच पाए। कई देखते हैं कि परीक्षा के सवाल या तो किसी अन्य विषय के हैं या उनसे हल नहीं हो पा रहे। विशेषज्ञों की माने तो ऐसे स्वप्न इन अपेक्षित दुर्घटनाओं का अनुकरण (सिमुलेशन) तैयार करते हैं। इससे हमें भविष्य में होने वाली ऐसी ही संभावित घटनाओं का एक बिना जोखिम वाले वातावरण में अनुभव हो जाता है। कुछ लोग व ज़्यादातर पुरातन और नवीन सभ्यताएँ सपनों को पूर्व-अनुभूति का भी दर्जा देती हैं। कई लोग शिष्य-जीवन के बीतने के कई वर्षों बाद भी ऐसे सपने देखते हैं। शायद ऐसे स्वप्न आपको भविष्य में आने वाली ऐसी ही मुश्किल घडीयो से लड़ने का विवेक प्रदान कर रही हैं - कह रही हैं कि याद करो कैसे उस समय भी तुम डरे थे, कितनी ही रातों की नींद तुमने व्यर्थ की थी - पर तुम विजयी हुए थे और आगे भी होगे।
सपने और भविष्य
इस लेख में मेरा केंद्रीय-भाव कल के विचार-विमर्श का विश्लेषण नहीं बल्कि मेरे अपने ख्यालों का संकलन करना है। इसलिए केवल मेरी रुचि वाले बिंदुओं का ही जिक्र करूँगा। उसी कार्यक्रम में आगे एक नया भाव सामने आया जो कि मुझे पचा नहीं। मेरे ही एक शिष्य ने कहा कि उसने एक बार स्वप्न में भौतिकी का एक ऐसा समीकरण देखा जो उसके लिए नया था। कई महीनों बाद उसने वही समीकरण कक्षा में पढ़ा। री एक प्रिय मित्र ने फिर ऐसे ही उनके एक स्वप्न का वर्णन किया जो कि अगले ही दिन सच हो गया। अब इसके पीछे क्या तथ्य ही सकता है?
इससे पहले की में इस मामले में अपना पक्ष रखूँ, मुझे शायद पाठकों को मेरे अपने मानसिक स्वरूप का एक संक्षेप वर्णन देना होगा जो कि मेरे लिए पक्षपाती हो सकता है। सीधी सी बात यह है कि मैं किसी भी ऐसी घटना या विषय पर न ही अमल करता हूँ और न ही उसको पल भर के लिए ही गंभीरता से लेता हूं जिसके पीछे एक वैज्ञानिक तथ्य न हो। मैंने काफी जतन से खुद को ऐसा बनाया है। यह मुझे मूर्तिपूजा में भरोसा करने से भी रोकता है और धार्मिक मामलों में किसी भी वैधान, कर्मकांड, आदि में हिस्सा लेने से भी। (धार्मिक विचारों पर मेरे मत प्रस्तुत करने के लिए मैं शीघ्र ही लेखों की एक श्रृंखला लिखने वाला हूँ।) इस भावना ने मेरा इन सपनों की तरफ रुझान खींचा और मैंने जीव-विज्ञान के अपने लघु ज्ञान का उपयोग इस पर किया।
हमारा शरीर बेहद शक्तिशाली मशीन है। आप शायद अनुमान न लगा पाए इस बात का। उदाहरण के तौर पर मस्तिष्क ही ले लीजिए। हमारी आँखें भौतिक विधानों पर कार्य करने वाली मशीनें हैं। गौरतलब है कि आँखें वास्तव में "देख" नहीं सकतीं उस मायने में जिसमें हम दिष्टि को समझते हैं। आँखों में प्रकाश की किरणों के अलग-अलग मापदंड जैसे कि वैवलैंथ को भेजने की शक्ति होती है। वह यह सूचना मस्तिष्क में पहुंचा देती हैं जो कि इसी सूचना के आधार पर एक सकल चित्र बनाता है, जो कि रंग, परछाई, आदि के साथ हमें 3-D द्रिष्टि के रूप में दिखता है। वास्तव में यह मस्तिष्क का खेल है। वह यही स्वांग निद्रावस्था में भी रचता है और आँखों से सूचना के अभाव में भी हमें द्रष्टि देता है।
हमारे पास ऐसी ही अन्य शक्तियाँ भी हैं। उदाहरण लेते हैं हमारे मस्तिष्क की चेहरा ढूँढ निकालने की प्रवत्ति का। हमें दीवारों पर चेहरे दिख जाते हैं। बादलों में से हम चेहरे ढूँढ निकालते हैं। कुछ ही हजार साल पहले हम अन्य जानवरों के साथ जंगलों में रहते थे। तब यह बेहद आवश्यक था कि छिपे हुए पशुओं को समय रहते पहचान लिया जाए। तब की ही यह प्रवृत्ति है। अन्य पशुओं में तो यह और भी विकसित होती होगी।
इसी को स्वपनों के इस खेल में उपयोग करते हैं। यह जाहिर है कि सपनों का अधिकतम भाग - खासकर जटिल, मामूली बातें - हम भूल जाते हैं। याद रह जाती है तो केवल एक ऊपरी तस्वीर, केवल अहम बातें। अभी हाल ही में जर्मन भाषा सीखना शुरू किया तो एक रात अंग्रेजी में सपना आया। सभी लोग अंग्रेजी बोल रहे थे। क्या बोल रहे थे? याद नहीं। लेकिन बोल अंग्रेजी रहे थे। ऐसा ही मेरे शिष्य के साथ हुआ होगा। उसने कोई समीकरण देखा होगा। प्रष्टभूमि में कोई गति की बात कर रहा होगा या उसे बताया गया होगा कि यह गति के समीकरण हैं। उसे वह बात याद रही होगी। कई माह बाद जब उसने यह वास्तव में पढ़ा तो उसके मस्तिष्क ने वह सपना अपने दस्तावेज़ों से निकाल सामने रखा। यह जाहिर इस बात से होता है कि वह शत प्रतिशत स्वप्न में देखे उस समीकरण को वास्तव में प्रष्ट पर नहीं लिख पाता।
मेरे मानना यही है। हमारे चारों ओर अराजकता है। हम हमेशा इसी के भीतर कुछ व्यवस्था ढूँढते रहते हैं। सपनों से अधिक अव्यवस्थित कुछ हो सकता है क्या? जैसे ही चारों ओर कुछ थोड़ा भी समान प्रतीत होता है, मस्तिष्क व्यवस्था ढूँढ़ने लगता है, इस अनर्थ के भीतर एक अर्थ की खोज में जुट जाता है।
सपनों में क्या छिपा है?
हम ही तो छिपे हैं सपनों में। हमारे अधिकतम सपने हमारी छिपी हुई आकांक्षाओं और अभिलाषाओं को दर्शाते हैं। क्या यह सच नहीं है कि हमारे ज़्यादातर सपने औरों के सामने हम व्यक्त ही नहीं कर सकते क्योंकि वे होते ही इतने निजी हैं। कुछ तो हमारे भीतर दबी हुई ग्लानियों को यूँ कुरेदते हैं कि हम खुद से भी उस बारे में बात करने से डरते हैं। पर हैं तो वह हम ही। इस संबंध में यह कहना अतिआवश्यक होगा कि इन्हें नजरअंदाज़ करना एक भूल भी हो सकती है क्योंकि फिर ये पहलू अन्य माध्यमों से व्यक्त हो सकते हैं।
इसे शेक्सपीयर के नाटक मेकबेथ की तीन जादूगरनियों के माध्यम से समझा जा सकता है। मेकबेथ एक महान योद्धा था जिसे एक रात अपने पथ पर ये तीन जादूगरनियाँ यह भविष्यवाणी करती मिलती हैं कि वह एक दिन डेनमार्क का राजा बनेगा। आने वाले समय में मेकबेथ अपना भविष्य बनाने के लिए कई पाप करता है। वह राजा तो बन जाता है परंतु अंत में मारा भी जाता है। कुछ विशेषज्ञ उन जादूगरनियों को हमारे भीतर छिपी महत्वकांक्षाओं के समान बताते हैं। संदर्भ यह है कि सपने भी इसी तरह हमें आक्रोशित भी कर सकते हैं और हमें सजग भी कर सकते हैं।
कुछ स्रोत:
बातचीत: https://thesecondcolour.blogspot.com/2020/05/what-is-civilization-under-lockdown.html
शोध-पत्र: https://journals.sagepub.com/doi/full/10.1177/147470490500300106
सुझाव:
"The Interpretation of Dreams" by Sigmund Freud
"Why Do You Keep Dreaming You Forgot Your Pants? It’s Science" by Alice Robb, The New York Times https://www.nytimes.com/2018/11/10/opinion/sunday/dreams-meaning-science.html
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