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Coronavirus Diaries #3 पूंजीवाद और समानता

पिछले कुछ दिनों में ऐसी सामग्री पढ़ने व सुनने को मिली जिसने बार-बार मेरा ध्यान समानता की ओर खींचा। तमाम अवधारणाएं मेरे भीतर झांकती और एकाएक अदृश्य हो जातीं। परीक्षा के लिए पढ़ाई करते समय पहली बार सोचा की "समानता है क्या?" इस बारे में व्यापक अध्ययन करूँ। इग्नू की स्नातक स्तर की राजनीति शास्त्र में इपीएस-11 की पढ़ाई मैं सभी जिज्ञासा रखने वालों को करने की सलाह दूँगा। 

इसके अलावा दो साप्ताहिक चर्चाओं में भी ऐसे विषय व कथन सामने आए जिन्होंने सोचने पर मजबूर किया। पहली चर्चा का विषय भारत की शिक्षा व्यवस्था से संबंधित था और दूसरी का विषय माज़लो के प्रेरणा के पिरामिड की प्रासंगिकता। पहली चर्चा की तैयारी करते समय मेरे मस्तिष्क में शिक्षा से पनपी असमानता व शिक्षा में समाई असमानता के महत्वपूर्ण व सामयिक मुद्दे ही भ्रांति पैदा कर रहे थे। इन्हीं मुद्दों पर कुछ विवेचना कर एक समीकरण तैयार किया। जब माज़लो के सिद्धांत पर पड़ताल की तब इसी समीकरण का एक पूरक मुझे मिला। जिस समीकरण की मैं बात कर रहा हूं, वह यूं तो मोटे तौर पर कोई अविष्कार नहीं है और ना ही मैं पहला व्यक्ति हूं जिसने राजनीतिक और समाजशास्त्र के इन विभिन्न सिद्धांतों और पहलुओं को यूं मिश्रित कर व्यक्त किया है पर मेरे लिए यह एक नवीन समझ है और स्वयं के स्तर पर इसे विकसित करने से मेरे लिए इसकी विशेषता अनपेक्षित रूप से सक्रिय करने वाली है।


असमानताएं आज और कल

इस पृष्ठभूमि में पहले समानता की पड़ताल करना अनावश्यक है। हाल ही में अमेरिका में भेदभाव को खत्म करने के लिए मुहिम चल रही है। रंग के आधार पर नस्लीय भेदभाव को हराने के लिए अगर एक पूरा आंदोलन शुरू करना पड़े तो हमें ऐसे देश को एक महाशक्ति कहने से ना केवल शर्मिंदा होना चाहिए बल्कि डरना भी चाहिए। अमेरिका न केवल आर्थिक और सैन्य क्षेत्रों में हमसे अरसों आगे है बल्कि सामाजिक तौर पर भी उसके पास हमें सिखाने के लिए काफी कुछ है। ऐसे में अश्वेत आबादी के साथ हो रहे संस्थागत भेदभाव को देखकर हमें अगर हमारे समाज में समाई अभद्र असमानता दिखाई नहीं देती तो लचर है हमारी दृष्टि और हमारी समझ।

इसी दौरान अमेरिका में ही ऐसी अच्छी खबर भी सामने आई जिसके भी पेड़ की शाखाओं के समान कई पहलू हैं। वहां के उच्चतम न्यायालय ने एक निर्णय में कहा कि एलजीबीटी समुदाय के साथ कार्यालय में किसी भी प्रकार का भेदभाव असहनीय है। अमेरिका में यौन अभिविन्यास आदि के आधार पर कई लोगों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी है। हालांकि इस निर्णय से ज़मीनी स्तर पर कुछ बदलाव आने में अभी समय लगेगा, कागज़ पर भी यह निर्णय एक ऐतिहासिक घटना है।

इतिहास इसी प्रकार की कई असमानताओं का साक्षी रहा है। इनमें से सबसे पुरानी स्त्रियों के संदर्भ में है। जैसे-जैसे समाज का ढांचा और जटिल होता चला वैसे ही मानव के स्वार्थ ने तरह-तरह के तर्कहीन विचारों को जन्म दिया। तमाम तरह के अत्याचार हुए। भारत में जाति के आधार पर जो उत्पीड़न समाज के एक बड़े तबके के साथ होता रहा और हो रहा है, उसकी भरपाई कोई भला कैसे करे? अमेरिका में अश्वेतों को गुलामी से स्वतंत्र करने एक विनाशकारी गृहयुद्ध हुआ। यह 1865 की बात है। कई शतक बीते और आज बात फिर वहीं पर आकर रुक गई। भारत में जातिप्रथा हजारों वर्षों से चली आ रही है। निश्चित ही केवल संविधान में इसके न्यायिक अंत की घोषणा से ज़मीनी हक़ीक़त में बदलाव नहीं आएगा। विभिन्न पथ अपनाने होंगे और इनको अपनाया भी जा रहा है। कुछ अच्छे संकेत दिखने भी लगे हैं।


धन की असमानता

गौरतलब इसी बीच एक नई तरह की असमानता ने जन्म लिया जो कि ना केवल उतनी ही प्रचंड है बल्कि जिसको हमारा समाज स्वीकार करता है। यह है आर्थिक असमानता जिसका रूप हमें समाज के दो वर्गों में विभाजन के तौर पर तो नहीं मिलता परंतु यह भी समाज को स्तरीकृत करता है। गरीबी इसका सबसे विकराल रूप है। और इस बात में कोई संशय नहीं कि यह समानता सर्वज्ञात भी है और इसके सर्वभूत होने ने इसे अदृश्य भी बना दिया है। यह होकर भी नहीं है। यह ना होकर भी सार्वभौमिक है। 

पूंजीवादी समाज का एक मूलभूत अंग है असमानता। जिस तरह से अमरीका की देखा-देखी में समस्त विश्व ने पूंजीवाद को अपनाया है, यह भी ध्यान देने योग्य है कि इन सरकारों का और इस प्रणाली का लक्ष्य भी एक आर्थिक तौर पर समान समाज बनाना नहीं है। पूंजीवाद मनुष्यों को एक दूसरे का प्रतिद्वंदी बनाता है। इनकी भी इस प्रतिस्पर्धा में दोनों की जीत होना संभव नहीं है क्योंकि संसाधन तो सीमित है। किसी को अधिक की प्राप्ति होगी। किसी को कम की। किसी अन्य को कुछ भी प्राप्त नहीं होगा।

मैं इसी असमानता के बारे में बात करता हूं। इसको खत्म करना संभव नहीं है। 20वीं सदी में साम्यवाद के नाम पर बहुत खेल खेले गए। जर्मनी के कार्ल मार्क्स के साम्यवाद के सिद्धांत के अनुसार जब तमाम आर्थिक असमानताएं अपनी हदें पार कर दें गी तब एक क्रांति होगी और एक साम्य समाज की स्थापना होगी। सभी के पास केवल पर्याप्त ही होगा उसे अधिक नहीं। जो होगा बराबर बांटा जाएगा। रूस ने इस सिद्धांत को दिल पर ले लिया। पहले साम्यवादी देश की स्थापना हुई और बर्बादी और अत्याचार का यह मंजर लगभग 90 वर्ष तक चला। यहां से यह अन्य देशों में फैला। भारत में भी साम्यवादी और समाजवादी सोच पर पार्टी गठित हुईं।

साम्यवाद समानता को जिस क्रूरता से रोकता है उसे अधिनायकवाद एक आवश्यकता बन जाता है। मनुष्य की स्वतंत्रता का नाश होता है। मानव संसाधन व्यर्थ जाता है और पर्याप्त उत्पादन भी ना होने से विकास स्थिर हो जाता है। अकाल आता है। विनाश आता है। असंतोष से क्रोध भभकता है और अराजकता फैलती है।


अवसर की समानता

मनुष्य अगर अपना विकास चाहता है तो आपसी प्रतिस्पर्धा उसके लिए एकमात्र सड़क है। इस प्रतिस्पर्धा का जो फल है वह पूंजी है। धन का संचय होना पूंजीवाद का एक अहम भाग है। जिसके पास यह अधिक होगा वह इसे निवेश कर सकेगा। धन इस प्रकार हस्तांतरित होता है और बढ़कर वापस आता है। परिणाम स्वरूप असमानता बढ़ती है।

ऐसे युग में जब असमानता हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग हो, हमें असमानता को ही नए सिरे से परिभाषित करना होगा। मानव अधिकारों के साथ समझौता केवल विकास के नाम पर नहीं किया जा सकता। ना ही यह एक नैतिक तर्क है कि कुछ लोगों की गरीबी से मनुष्यों के एक ऐतिहासिक तबके को फायदा पहुंचा है। हमें हमारा समय कितना ही विचलित करे, यह एक तथ्य है कि आज भुखमरी व मर्ज अपवाद हैं, नियम नहीं। इंसान की आयु-संभाविता इतिहास के किसी पड़ाव पर इतनी नहीं रही। यह सब विज्ञान की देन है और विज्ञान पूंजीवाद की। परंतु इसके लिए हम एक बड़े इंसानी अंश को अतार्किक तरीके से लाभों से वंचित नहीं रख सकते। हमें एक सार्वभौमिक ढंग से "अवसर की समानता" प्रदान करनी होगी।

आज अवसर की समानता ही इस बढ़ती असमानता से लड़ने का तरीका है। हर वर्गीकरण के विरुद्ध — जाति, धर्म, लिंग, रंग, जन्म, जन्मस्थान, प्रेम का विकल्प, आदि — सभी भिन्नताओं की उपेक्षा कर हमें समान अवसर प्रदान करने होंगे। इन सभी के परे हैं कुछ और असमानताएं जो कि इस अवसर की समानता को शून्य करती हैं।


असमानता को अपनाना

हमें अवसर क्यों चाहिए? हम सभी के भीतर जन्मजात प्रतिभाएं हैं। इन प्रतिभाओं का उपयोग हम तभी कर सकेंगे जब हमें वह अवसर मिलेगा। हालांकि अगर एक व्यक्ति के पास कुछ मूलभूत सुविधाएं नहीं होती हैं — जैसे कि पौष्टिक खाना, स्वच्छ पानी, रहने लायक घर, पहनने को कपड़े, चिकित्सा, आदि — तब यह अवसर की औपचारिक समानता शून्य हो जाती है। कहने को तो मनुष्य समान रूप से प्रतिस्पर्धा का प्रतिभागी है परंतु वास्तविक तौर पर वह समान नहीं है।

इस बात को माज़लो खूबी के साथ दर्शाते हैं। उनके अनुसार मनुष्य अपनी चेतना को गदगद तो तब करेगा जब उसके पास मूलभूत सेवाओं की पर्याप्त पूंजी होगी। जब तक मूलभूत आवश्यकता का अभाव है वह एक बंदी की भांति कार्य करेगा। अवसर और विकल्प की उपस्थिति में भी वह दबा रहेगा बोझ के तले। इस दासता का निराकरण संभव है जब सरकार सभी को एक न्यूनतम संपत्ति — चाहे वह आय के स्वरूप में हो या किसी प्रकार में — मुहैया कराए। सभी नीतियों के पीछे तर्क यह समानता होनी चाहिए जो कि मनुष्य के मनुष्य पर स्वामित्व को बनने से रुकेगी। मनुष्य तब अपनी प्रतिभा का उपयोग कर पाएगा जब स्पर्धा निष्पक्ष होगी।

इसी बीच बात शिक्षा की भी आती है जिसका मुख्य लक्ष्य मानव संसाधन की सुचारू वृद्धि और विकास होता है। आर्थिक असमानता की एक व्याख्या यह भी है कि एक कार्यरत निःशुल्क सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली के अभाव में गरीब अपनी प्रतिभाओं को विकसित नहीं कर सकते। इसका एक परिणाम यह भी है कि शारीरिक तौर से स्वतंत्र मनुष्य मानसिक रूप से अप्रगतिशील विचारों का बंदी बन जाता है। यह भी एक गुलामी है और शिक्षा के लिए राशि का अनुरोध करना स्वतंत्रता की बोली लगाने जैसा है जो कि अनैतिक कृत्य है। इसी कारण सरकार को एक क्रियाशील शिक्षा व्यवस्था भी कार्यरत करनी होगी जो कि मनुष्य को न्यूनतम सुविधा प्रदान कर पाए।


न्यूनतम क्या होना चाहिए?

न्यूनतम क्या होना चाहिए? यह समय-समय पर देश और सरकार की आर्थिक स्थिति से निर्धारित किया जा सकता है। हालांकि इसी बीच यह गौरतलब है कि जिन भेदों को हम नष्ट करने के पीछे हैं — जैसे कि रंग, लिंग, जातिवाद — वे सब मनुष्य के विकल्प के परे हैं। जन्मजात हैं। इनके अनुसार भेद करना तर्कविरुद्ध है। वहीं समान अवसर के साथ प्रतिस्पर्धा से जन्मी असमानताएं पूर्ण तरह से तर्कशील हैं। ऐसे भेदों का जन्म मनुष्य के यत्न के परिणामस्वरूप होता है। 

वहीं एक जन्मजात भेद धन की भी है। उत्तराधिकार से मिले धन पर भी मनुष्य के विकल्पों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। गरीब का शिशु गरीब, अमीर का अमीर होगा। ऐसी असमानताओं को कम करने के लिए एक "उत्तराधिकार कर" लगाया जा सकता है जो कि यह जानते हुए बनाना चाहिए कि मनुष्य अपने अधिकतम कर्म अपने परिवार के लिए करता है। अगर उसके कर्म का फल उसके बच्चों तक नहीं पहुंचेगा तो यह पूंजीवादी सभ्यता के अकेले लाभ — प्रोत्साहन — को खत्म कर सकता है।

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